पल भर में सूनी हुई जयवंती की गोद एक साथ जिगर के टुकडों ने छोडा साथ अस्पतालों की चौखट पर माथा रगडने में ही बीत गई रैना!
नेरचौक मेडिकल कालेज पंहुचने से पहले ही उड गए प्राण पंखेरू

पब्लिक फोकस मंडी।
सहेली गांव में आज मातम पसरा है। एक घर से आती मातमी आवाजें सुनने वाले का कलेजा फाड रही हैं। एक हंसता खेलता परिवार पल भर में उजड गया है। दो मासूम काल का ग्रास बन गए हैं। सेहली में जयवंती की गोद पलभर में सूनी हो गई है। एक साथ जिगर के टुकडों ने साथ छोड दिया। यह सब तब हुआ जब जयवंती ने अपने दो बच्चों का जीवन बचाने के लिए हर संभव मुमकिन की। बच्चों की सलामती के लिए अस्पतालों की चौखट पर माथा भी रगडा और नेरचौक मेडिकल कालेज की दहलीज तक भी दौड लगाई लेकिन जब तक मेडिकल कालेज पंहुचे उससे पहले ही दो मासूम इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। सेहली गांव से सबंध रखनी वाली जयवंती की गोद पल भर में उजड गई है। जयवंती के घर में गुरूवार रात तक दो बच्चों की हंसी गूंज रही थी। रात को जयवंती ने अपने पति महेंद्र सहित छह साल के बेटे नक्श और नौ साल की बेटी काव्य के साथ खाना खाया। इस समय किसी को यह अहसास तक नहीं था कि इसके बाद दोनों मासूम एक पल में मौत की आगोश में चले जाएंगे। खाना खाने के बाद पूरा परिवार सो गया। आधी रात के बाद बच्चों की अचानक तबीयत बिगडी तो शुरूआती दौर में किसी को कुछ समझ ही नहीं आया कि बच्चे उलटियां क्यों कर रहे हैं? इस बीच कमरे में नजर घुमाई गई तो फिर एक सांप दिखाई दिया और जयवंती तथा महेंद्र को यह समझने में देर नहीं लगी कि बच्चों को सांप ने काट लिया है। मां बाप ने बच्चों का इलाज करवाने के लिए मंडी शहर के दो निजी अस्पतालों सहित जोनल अस्पताल का रूख किया लेकिन अस्पतालों में डाक्टर ना होने के कारण इलाज शुरू नहीं हो सका। जोनल अस्पताल में इन बच्चों के इलाज की अभी तैयारी ही चल रही थी कि बच्चों की तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो मां बाप बच्चों का उपचार करवाने के लिए नेरचौक मेडिकल कालेज को निकल गए। नेरचौक मेडिकल कालेज में जब तक बच्चों को पंहुचाया गया तब तक उनको मौत ने अपना बना लिया था और डाक्टरों ने दोनों को ब्राड डेड घोषित कर दिया।
खुशियों के रंग सजाने वाले का जीवन हुआ बदरंग
महेंद्र लोगों के जीवन में खुशियों के रंग भरता रहा है लेकिन आज उसका अपना जीवन दो मासूमों के साथ छोड जाने से बदरंग हो गया है। महेंद्र दूसरों के घरों में पेंट्रर का काम करता है और उसकी पत्नी जयवंती गृहस्थी संभालती है। इसी परिवारिक व्यवस्था में नक्श और काव्य की हंसी और किलकारियों जीवन को खुशनुमा बनाए हुए थी कि पलभर में सब कुछ खत्म हो गया।
बच्चों के इलाज की तैयारी में ही चले गए –
जोनल अस्पताल के एमएस डाक्टर दिनेश बताते हैं कि दो बच्चों को सर्पदंश होने के संदेह में अस्पताल लाया गया था। इस दौरान इलाज की तैयारी शुरू की गई और विशेषज्ञ डाक्टरों को बुलाया गया तब तक उपचाराधीन बच्चों को लेकर साथ आए अभिभावक अस्पताल से लेकर चले गए।
यही रह गई अंतिम याद-
रक्षाबंधन पर काव्य ने अपने भाई की कलाई पर सुरक्षा का धागा बांधा था। परिवार के पास भाई बहन के प्यार की अब यही आखिरी निशानी बची है। भाई बहन ने एक साथ दुनिया को अलविदा कह दिया है और इससे पूरे क्षेत्र में मातम पसर गया है। माता जयवंती बदहवास है और पिता महेंद्र मौन हैं। घर में मातम पसरा है। लोग ढांढस दे रहे हैं और बच्चे जब किसी को नजर नहीं आ रहे हैं तो फिर उनकी आंखों से भी बरबस आंसू ही निकल रहे हैं।



