कोटरूपी पहाड का स्वरूप कुरूप, फिर फटेगा मंडी आईआईटी की स्टडी ने चौंकाया ‘ पहाड़ का दाहिना हिस्सा किसी भी समय बरपा देगा कहर!

पब्लिक फोकस कोटरूपी(मंडी)
राष्ट्रीय राजमार्ग-154 पर स्थित कोटरोपी पहाड का स्वरूप कुरूप हो गया है। पहाड फिर फटने को तैयार है। मंडी आईआईटी की स्टडी ने कोटरूपी पहाड के कोप से अवगत करवाया है। पहाड का दाहिना हिस्सा किसी भी समय कहर बरपा सकता है। यहां फैक्टर ऑफ सेफ्टी ने खतरे की घंटी बजा दी है। आईआईटी ने इस स्टडी के बाद पहाड को दरकने से बचाने के उपाय भी सुझाए हैं। कोटरोपी का पहाड़ एक फिर से दहशत फैलाने लगा है। मंडी आईआईटी के वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत भूवैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा किया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग-154 पर स्थित कोटरोपी भूस्खलन क्षेत्र का दाहिना हिस्सा बेहद अस्थिर हो चुका है और किसी भी बड़े भूस्खलन के कगार पर है। फैक्टर ऑफ सेफ्टी खतरे की घंटी बजा रहा है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स नेचर पोर्टफोलियो में बीते 27 जून को प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि पहाड़ी के दाहिने हिस्से का फैक्टर ऑफ सेफ्टी महज 0.35 से 0.5 के बीच है। इसका सीधा मतलब है कि पहाड की ढलान किसी भी समय ढह सकती है। चौंकाने वाली बात यह है कि अध्ययन में लिए गए सभी सात प्रोफाइल्स का सुरक्षा गुणांक एक से भी नीचे है। यह पूरी पहाड़ी आंतरिक रूप से कमजोर हो चुकी है।
कैसे किया गया अध्ययन?
शोध टीम ने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। ड्रोन येएवी से उच्च रिज़ॉल्यूशन मैपिंग, जर्मन सैटेलाइट तनडेम एक्स की इमेजरी, मैदानी सर्वेक्षण और कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए पूरी ढलान का विश्लेषण किया गया। लिमिट इक्विलिब्रियम मेथड और फिनाइट एलिमेंट मॉडल दोनों का इस्तेमाल कर स्थिरता का आकलन किया गया।
अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता और मंडी आईआईटी के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला का कहना है कि कोटरोपी में भविष्य में होने वाली जान-माल की हानि को रोकने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। सुरक्षात्मक दीवारें और बेहतर ड्रेनेज सिस्टम जैसी शमन रणनीतियां तैयार की जा सकती हैं।
पहाड के बार बार फटने का यह है कारण
शोध में साफ बताया गया है कि इस क्षेत्र में बार-बार भूस्खलन की मुख्य वजहें हैं मुख्य सीमा भ्रंश रेखा (मेन बाउंड्री थ्रस्ट) की उपस्थिति, टेक्टोनिक गतिविधियां, चट्टानों की प्रतिकूल दिशा, गहरी दरारें और जोड़ों का जाल है। भारी बारिश का पानी इन दरारों में घुसकर चट्टानों और मिट्टी की पकड़ पूरी तरह खत्म कर देता है।
पहाड ने 2017 में निगले 46 प्राण
कोटरूपी पहाड में 13 अगस्त 2017 की मध्य रात को इसी जगह बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ था। इसमें दो एचआरटीसी बसें मलबे में दब गई थीं और 46 लोगों की जान चली गई थी। उसके बाद से यह क्षेत्र बार-बार सक्रिय होता रहा है। मंडी आईआईटी की यह स्टडी बता रही है कि खतरा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। पहाड़ी के दाहिने हिस्से और ऊपरी क्राउन क्षेत्र में खतरा पहले से ज्यादा हुआ है।
कोटरूपी पहाड पर इन्होंने किया शोध
दरकते कोटरूपी पहाड पर स्टडी करने वालों में मंडी आईआईटी के प्रोफेसर नितेश धीमान, अंकित सिंह और डेरिक्स प्रेज शुक्ला शामिल हैं। यह तीनों ही आईआईटी मंडी सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग स्कूल में शोध कर रहे हैं। इसमें नेपाल त्रिभुवन विश्वविद्यालय के नीरज केसी और हेल्महोल्ट्ज़ सेंटर जर्मनी के प्रोफेसर शरद कुमार गुप्ता शामिल रहे हैं।
